Supreme Court on Freebies vs Economy: क्या ‘मुफ्त की रेवड़ियां’ देश को कंगाली की ओर ले जा रही हैं? सुप्रीम कोर्ट की सख्ती और राज्यों के कर्ज का पूरा कच्चा चिट्ठा
नई दिल्ली: भारत में चुनावी मौसम आते ही राजनीतिक दलों के बीच ‘मुफ्त उपहारों’ Supreme Court on Freebies vs Economy यानी Freebies की होड़ मच जाती है। कोई मुफ्त बिजली का वादा करता है, तो कोई हर महीने महिलाओं के खाते में नकद राशि डालने का। लेकिन गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट ने इस ‘रेवड़ी संस्कृति’ पर जो टिप्पणी की है, उसने देश की सियासत और अर्थशास्त्रियों के बीच एक नई बहस छेड़ दी है। कोर्ट ने साफ कहा कि चुनाव आयोग और केंद्र सरकार इस मुद्दे पर मूकदर्शक नहीं बने रह सकते।

Supreme Court on Freebies vs Economy: मुफ्त की रेवड़ियों पर SC सख्त, जानें किन राज्यों का खजाना है खतरे में
Supreme Court on Freebies vs Economy सुप्रीम कोर्ट की कड़ी नाराजगी: “खजाने पर टाइम बम है फ्रीबीज”
गुरुवार को हुई सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय ने कड़ी नाराजगी जताते हुए कहा कि Supreme Court on Freebies vs Economy लोकलुभावन घोषणाएं चुनाव की निष्पक्षता को खत्म कर रही हैं। Supreme Court on Freebies vs Economy जस्टिस की बेंच ने टिप्पणी की, “पार्टियां वोट पाने के लिए ऐसे वादे करती हैं जिन्हें पूरा करने का उनके पास कोई वित्तीय रोडमैप नहीं होता। यह देश की अर्थव्यवस्था के लिए एक टाइम बम की तरह है।”
कोर्ट ने चुनाव आयोग को फटकार लगाते हुए पूछा कि वह इन घोषणाओं पर नियंत्रण के लिए गाइडलाइंस क्यों नहीं बना रहा है। कोर्ट ने सुझाव दिया कि राजनीतिक दलों को अपने घोषणापत्र के साथ यह भी बताना चाहिए कि वे इन योजनाओं के लिए पैसा कहाँ से लाएंगे।
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प्रमुख राज्यों की ‘फ्रीबी’ योजनाएं और अर्थव्यवस्था पर बोझ-Supreme Court on Freebies vs Economy
भारत के कई राज्य इस समय भारी कर्ज के नीचे दबे हैं, फिर भी वहां मुफ्त योजनाओं का विस्तार जारी है। आइए डेटा के माध्यम से समझते हैं कि किन राज्यों की स्थिति सबसे अधिक चिंताजनक है:

Supreme Court on Freebies vs Economy: मुफ्त की रेवड़ियों पर SC सख्त, जानें किन राज्यों का खजाना है खतरे में
1. पंजाब (Punjab): कर्ज का सबसे बड़ा संकट
पंजाब भारत का सबसे अधिक कर्जदार राज्य माना जाता है। यहाँ की ‘मुफ्त बिजली’ योजना सरकार के लिए बड़ा वित्तीय बोझ है।
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प्रमुख योजना: 300 यूनिट मुफ्त बिजली।
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सालाना खर्च: लगभग ₹18,000 – ₹20,000 करोड़।
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Debt-to-GSDP Ratio: पंजाब का कर्ज उसके GSDP (सकल राज्य घरेलू उत्पाद) का लगभग 45-48% पहुँच चुका है, जो देश में सबसे अधिक है।
2. मध्य प्रदेश (Madhya Pradesh): लाड़ली बहना और किसान कल्याण
मध्य प्रदेश में हाल के वर्षों में नकद हस्तांतरण की योजनाओं पर फोकस बढ़ा है।
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प्रमुख योजनाएं: लाड़ली बहना योजना (₹1250/माह), 0% ब्याज पर किसान ऋण।
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सालाना खर्च: लाड़ली बहना पर ही सालाना करीब ₹15,000 से ₹18,000 करोड़ खर्च होते हैं।
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राजस्व का प्रतिशत: राज्य के कुल राजस्व प्राप्ति का एक बड़ा हिस्सा (करीब 15-18%) केवल ब्याज चुकाने और इन कल्याणकारी योजनाओं में चला जाता है।
3. राजस्थान (Rajasthan): स्वास्थ्य और नकद योजनाएं
राजस्थान में भी मुफ्त बिजली और ओल्ड पेंशन स्कीम (OPS) जैसे मुद्दों ने वित्तीय संतुलन Supreme Court on Freebies vs Economy को प्रभावित किया है।
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प्रमुख योजना: मुख्यमंत्री नि:शुल्क बिजली और अन्नपूर्णा फूड पैकेट।
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Debt-to-GSDP Ratio: राजस्थान का कर्ज GSDP का करीब 38-40% है। यहाँ हर नागरिक पर औसत कर्ज का बोझ लगातार बढ़ रहा है।
4. कर्नाटक और तेलंगाना: ‘गारंटी’ कार्ड का असर
कर्नाटक में ‘शक्ति योजना’ (महिलाओं के लिए मुफ्त बस यात्रा) और तेलंगाना में ‘रैयथु बंधु’ जैसी योजनाओं का बजट हजारों करोड़ में है। कर्नाटक की 5 प्रमुख गारंटियों का सालाना खर्च ₹50,000 करोड़ से अधिक होने का अनुमान है, जो राज्य के विकास बजट में कटौती का कारण बन रहा है।
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राज्यों के कर्ज का डेटा एक नजर में (Table) Supreme Court on Freebies vs Economy
| राज्य | प्रति किसान/परिवार औसत कर्ज (अनुमानित) | Debt-to-GSDP Ratio (2025-26) | मुख्य फ्रीबी खर्च (सालाना) |
| पंजाब | ₹2,03,249 | 48.2% | ₹20,000 करोड़ (बिजली) |
| राजस्थान | ₹1,13,865 | 39.5% | ₹12,000 करोड़ (बिजली/राशन) |
| मध्य प्रदेश | ₹74,420 | 29.8% | ₹18,000 करोड़ (लाड़ली बहना) |
| आंध्र प्रदेश | ₹2,45,554 | 33.1% | ₹25,000 करोड़ (नकद योजनाएं) |
Welfare vs Freebies: क्या सही है और क्या गलत?
अर्थशास्त्रियों का मानना है कि शिक्षा पर निवेश, मिड-डे मील और मुफ्त इलाज ‘फ्रीबी’ नहीं बल्कि ‘Human Capital Investment’ है। लेकिन मुफ्त मोबाइल, टीवी, या सीधे नकद पैसे देना (बिना किसी उत्पादकता के) अर्थव्यवस्था के लिए घातक है।
जब सरकार सड़क, पुल या फैक्ट्री बनाने के बजाय पैसा मुफ्त बांटने में खर्च करती है, तो राज्य की ‘पूंजीगत व्यय’ (Capital Expenditure) क्षमता कम हो जाती है। इसका परिणाम यह होता है कि भविष्य में रोजगार के अवसर कम हो जाते हैं और महंगाई बढ़ जाती है।

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Supreme Court on Freebies vs Economy क्या है समाधान?
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से एक Expert Committee बनाने को कहा है जिसमें वित्त आयोग, आरबीआई और नीति आयोग के सदस्य शामिल हों। विशेषज्ञों के सुझाव निम्नलिखित हैं:
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FRBM Act का सख्ती से पालन: राज्यों को अपनी औकात (राजस्व) से ज्यादा कर्ज लेने से रोकना।
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Manifesto Auditing: चुनाव आयोग को यह अधिकार मिले कि वह पार्टियों से पूछ सके कि वादों के लिए पैसा कहाँ से आएगा।
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वित्तीय पारदर्शिता: जनता को यह बताया जाए कि ‘मुफ्त’ मिलने वाली चीज का भुगतान अंततः उन्हीं के टैक्स से होगा।
सुप्रीम कोर्ट की नाराजगी वाजिब है। अगर भारत को 2047 तक ‘विकसित भारत’ बनना है, तो हमें रेवड़ी संस्कृति से निकलकर उत्पादकता आधारित विकास की ओर बढ़ना होगा। चुनाव जीतने के लिए खजाना खाली करना आने वाली पीढ़ियों के साथ अन्याय है।
मुफ्त की रेवड़ियों (Freebies) से जुड़े अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
Q1. सुप्रीम कोर्ट ने Freebies पर क्या टिप्पणी की है? Ans: सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (19 फरवरी 2026) को कहा कि चुनाव से पहले मुफ्त घोषणाएं करना देश की अर्थव्यवस्था के लिए एक ‘टाइम बम’ की तरह है। कोर्ट ने चुनाव आयोग को फटकार लगाते हुए इसे रोकने के लिए कड़े नियम बनाने का निर्देश दिया है।

Supreme Court on Freebies vs Economy: मुफ्त की रेवड़ियों पर SC सख्त, जानें किन राज्यों का खजाना है खतरे में
Q2. ‘जनकल्याण’ (Welfare) और ‘फ्रीबी’ (Freebies) में क्या अंतर है? Ans: शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी ढांचा (जैसे स्कूल, अस्पताल, मिड-डे मील) पर खर्च ‘जनकल्याण’ है। जबकि चुनाव जीतने के लिए मुफ्त मोबाइल, टीवी या बिना किसी वित्तीय योजना के नकद बांटना ‘फ्रीबी’ या ‘रेवड़ी’ माना जाता है। Supreme Court on Freebies vs Economy
Q3. भारत का सबसे अधिक कर्जदार राज्य कौन सा है? Ans: ताजा आंकड़ों के अनुसार, पंजाब भारत का सबसे अधिक कर्जदार राज्य है। इसका Debt-to-GSDP अनुपात करीब 48% तक पहुँच गया है, जिसका मुख्य कारण मुफ्त बिजली जैसी बड़ी घोषणाएं हैं।
Q4. क्या मुफ्त योजनाओं से राज्य दिवालिया हो सकते हैं? Ans: हाँ, यदि राज्य अपनी कुल आय (Revenue) से अधिक पैसा मुफ्त योजनाओं पर खर्च करते हैं और विकास कार्यों (Capital Expenditure) की अनदेखी करते हैं, तो वे श्रीलंका जैसे आर्थिक संकट में फंस सकते हैं। Supreme Court on Freebies vs Economy
Q5. चुनाव आयोग इन घोषणाओं को क्यों नहीं रोकता? Ans: वर्तमान में चुनाव आयोग के पास राजनीतिक दलों के चुनावी वादों को नियंत्रित करने की सीमित शक्तियां हैं। सुप्रीम कोर्ट इसी कमी को दूर करने के लिए दिशा-निर्देश तय करने पर विचार कर रहा है।












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