शनिदेव के प्रकोप से सभी डरते हैं और उनके गुस्से से बचना चाहते हैं, पर 16 साल तक के बच्चे शनिदेव के प्रकोप से बचे रहते हैं और उन पर शनिदेव की साढ़ेसाती और ढैया का भी कोई असर नहीं होता है। दरअसल ऋषि पिपलाद के श्राप के कारण शनिदेव 16 से कम उम्र के बच्चों को कोई सजा नहीं देते हैं और उन पर शनि का प्रकोप भी नहीं पड़ता।

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क्या है पौराणिक कथा, आखिर क्यों मिला शनिदेव को यह श्राप ?

पौराणिक कथा के अनुसार वज्र बनाने के लिए महर्षि दधिचि ने जब अपनी हड्डियां दान कर दी तो उनकी पत्नी सुवर्चा व्यथित हो गई और पति के साथ सती होने लगी। तभी भविष्यवाणी हुई और उन्हें पता चला कि उनके गर्भ से भगवान शिव का अंश जन्म लेगा, उसकी रक्षा करना जरूरी है। इसके बाद सुवर्चा ने पीपल के पेड़ के किनारे बच्चे को जन्म दिया और सती हो गई।

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इस बच्चे का बचपन बहुत कष्ट में बीता और उसने शिव की तपस्या कर ब्रम्हादण्ड हासिल किया। ब्रम्हादण्ड हासिल करने के बाद पिप्पलाद को पता चला कि शनिदेव के कारण ही उन्हें सभी कष्ट भोगने पड़े हैं। इससे नाराज होकर उन्होंने शनिदेव को उनके आसन से गिरा दिया और उन पर ब्रम्हादण्ड फेंक कर मारे इससे शनिदेव का पैर कमजोर हो गया। अंत में पिप्पलाद ने इस शर्त पर शनिदेव को माफ किया कि 16 साल तक के बच्चों को शनिदेव का प्रकोप नहीं सताएगा। इसी वजह से पीपल की पूजा करने वालों पर शनि का प्रभाव नहीं पड़ता है।

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